Tuesday, March 27, 2018

प्रजापति से कॉर्पोरेट सभ्यता तक : क्या प्रकृति अपना हिसाब स्वयं लिखती है?

प्रजापति से कॉर्पोरेट सभ्यता तक : क्या प्रकृति अपना हिसाब स्वयं लिखती है?

— देवरथ थापौली

प्राचीन भारतीय चिंतन में प्रजापति केवल एक देवता नहीं, बल्कि सृष्टि के संचालन, पालन-पोषण और विस्तार के प्रतीक थे। स्मृतियों, पुराणों और वैदिक कल्पनाओं में प्रजापति की भूमिका ऐसी व्यवस्था की थी, जहाँ सृजन का उद्देश्य केवल जनसंख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रकृति, जीव-जगत और मानव समाज के बीच संतुलन बनाए रखना था।

उस समय सभ्यता का विकास प्रकृति के साथ संघर्ष करके नहीं, बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व में किया जाता था। मनुष्य स्वयं को सृष्टि का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक उत्तरदायी अंग मानता था।

किन्तु आज की सभ्यता एक अलग दिशा में चल पड़ी है।

काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार— ये पाँच प्रवृत्तियाँ आधुनिक समाज के विकास का अनकहा ईंधन बन गई हैं। विभिन्न पंथ, समुदाय, संस्थाएँ और संगठन अपने-अपने विचारों, पहचानों और जनसंख्या विस्तार के साथ ऐसी सामाजिक संरचनाएँ निर्मित कर रहे हैं, जो कई बार प्रकृति की वहन क्षमता और संतुलन को पीछे छोड़ देती हैं।

विरोधाभास यह है कि वे भी किसी न किसी रूप में "सृजन" और "विस्तार" की ही बात करते हैं, जो कभी प्रजापति के विचारों का मूल था। परंतु अंतर यह है कि प्रजापति का विस्तार संतुलन पर आधारित था, जबकि आधुनिक विस्तार प्रायः उपभोग, संसाधनों के दोहन और प्रतिस्पर्धी वर्चस्व पर आधारित दिखाई देता है।

जंगल कट रहे हैं, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं, जलवायु बदल रही है। ऐसे में प्रश्न उठता है—

क्या प्रकृति अपना हिसाब स्वयं लेती है?

शायद "कर्मा इज़ बैक" का अर्थ किसी रहस्यमयी दंड से अधिक एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया है। जब कोई सभ्यता अपने अस्तित्व के आधार— जल, वन, भूमि और जैविक संतुलन— को कमजोर करती है, तो परिणाम अंततः उसी के सामने लौटकर आते हैं। सूखा, बाढ़, महामारी, संसाधन-संघर्ष और सामाजिक अस्थिरता उसी प्रतिक्रिया के रूप हो सकते हैं।

और तब दूसरा प्रश्न जन्म लेता है—

क्या भविष्य में कोई नया व्यक्तित्व उभरेगा?

संभव है कि वह कोई एक व्यक्ति न हो। वह एक नई चेतना, नया विचार या मानवता की सामूहिक समझ भी हो सकती है— जो पुनः यह स्मरण कराए कि विकास का अर्थ केवल विस्तार नहीं, बल्कि संतुलन है; प्रगति का अर्थ केवल उपभोग नहीं, बल्कि संरक्षण है।

यदि कभी कोई "विश्वगुरु" उभरेगा, तो उसकी पहचान किसी साम्राज्य, समुदाय या संख्या से नहीं होगी। उसकी पहचान इस बात से होगी कि वह मनुष्य और प्रकृति के बीच टूट चुके संवाद को फिर से स्थापित कर सके।

क्योंकि सृष्टि का वास्तविक नेतृत्व वही कर सकता है, जो सृजन को विस्तार से पहले संतुलन में देखे।

“प्रजापति की अवधारणा शायद अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता है।”
— देवरथ थापौली