Wednesday, June 24, 2026

दोहरे चरित्र का युग : कथनी और करनी के बीच की खाई

 


दोहरे चरित्र का युग : कथनी और करनी के बीच की खाई

समाज में सबसे बड़ा संकट विचारों की कमी नहीं, बल्कि चरित्र की कमी है। आज उपदेश देना आसान है, परंतु स्वयं उन सिद्धांतों पर चलना अत्यंत कठिन।

कोई परिवार और नैतिकता का संदेश देता है, पर उसका निजी जीवन उसी संदेश से मेल नहीं खाता। कोई शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य के सपने बेचता है, जबकि उसके आसपास की वास्तविकताएँ उन आदर्शों का विरोध करती दिखाई देती हैं। कोई मानवता, सेवा और करुणा की बात करता है, पर उसके कर्म विवादों और विरोधाभासों से घिरे रहते हैं।

इसी प्रकार अनेक लोग अपने व्यक्तिगत दुख, संघर्ष और आघात को भी एक उत्पाद बना चुके हैं। कोई पत्रकार निष्पक्षता का दावा करता है, पर विचारधारा के अनुसार सत्य को मोड़ देता है। कोई नेता राष्ट्रहित, त्याग और ईमानदारी का वचन देता है, पर सत्ता मिलते ही भ्रष्टाचार, परिवारवाद और जनता को भ्रमित करने के खेल में शामिल हो जाता है।

कुछ संस्थाएँ समाजसेवा के नाम पर बनती हैं, लेकिन उनकी आड़ में व्यक्तिगत लाभ और गोरखधंधे पनपते हैं। कुछ लोग साधु का वेश धारण करते हैं, पर उनका उद्देश्य आत्मिक उत्थान नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति होता है। कुछ कथावाचक और आध्यात्मिक मंच भी अब श्रद्धा से अधिक व्यवसाय का रूप लेते दिखाई देते हैं।

समस्या यह नहीं कि मनुष्य अपूर्ण है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति अपने दोषों को स्वीकार करने के बजाय स्वयं को आदर्श घोषित करने लगता है। वह दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाता है, पर अपने लिए अलग नियम बना लेता है।


इसके विपरीत, उदाहरण-मुखी व्यक्ति वह है जो कम बोलता है और अधिक जीता है। वह त्याग पर भाषण नहीं देता, स्वयं त्याग करता है। वह सत्य की घोषणा नहीं करता, बल्कि अपने आचरण से उसे प्रमाणित करता है। वह ईमानदारी का विज्ञापन नहीं बनाता, बल्कि परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने पर भी सिद्धांत नहीं छोड़ता।

समाज अंततः शब्दों से नहीं, उदाहरणों से बदलता है। उपदेश कुछ समय के लिए प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन चरित्र पीढ़ियों को प्रेरित करता है।

दोहरे चरित्र वाले लोग अक्सर अपने लिए अपवाद और दूसरों के लिए नियम बनाते हैं; जबकि उदाहरण-मुखी व्यक्ति अपने लिए सबसे कठोर नियम निर्धारित करता है।

अंततः, इतिहास भाषणों को नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई को याद रखता है। क्योंकि—

"सत्य का प्रदर्शन करने से कोई सत्यवादी नहीं बन जाता; सत्यवादी वह है जिसके जीवन और वचन के बीच दूरी न हो।"


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